मुंबई/गुवाहाटी। दिग्गज गायक-संगीत निर्देशक बप्पी लाहिड़ी (Veteran singer-music director Bappi Lahiri) का मंगलवार देर रात यहां निधन हो गया। वह 69 वर्ष के थे और उन्होंने क्रिटिकेयर अस्पताल में अंतिम सांस ली, जहां उन्हें कुछ पोस्ट-कोविड दिक्कतों के कारण भर्ती कराया गया था। बप्पी लाहिड़ी के निधन पर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा (Assam Chief Minister Himanta Biswa Sarma) ने शोक व्यक्त किया है। अपने ट्वीट में हिमंता ने लिखा, '1980 के दशक में भारत में डिस्को संगीत को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले संगीतकार बप्पी लाहिड़ी जी के निधन से गहरा दुख हुआ। उनका संगीत आज भी लोकप्रिय है। उनके शोक संतप्त परिवार के सदस्यों और प्रशंसकों के प्रति मेरी गहरी संवेदना है। उनकी आत्मा को सद्गति मिले। ओम शांति!

पश्चिम बंगाल में जन्मे, लाहिड़ी ने पहली बार एक बंगाली फिल्म 'दादु' के लिए संगीत तैयार किया और फिल्म 'नन्हा शिकारी' के साथ अपने बॉलीवुड करियर की शुरूआत की थी। उन्होंने 'डिस्को डांसर' के लिए अपने चार्टबस्टिंग संगीत और 'जिमी, जिमी, आजा, आजा' गीत और बाद में 'जखमी', 'लहू के दो रंग' के लिए सुपरहिट संगीत के साथ वैश्विक प्रशंसा प्राप्त की। उनके निधन पर बॉलीवुड की प्रमुख हस्तियों ने शोक व्यक्त किया है।

डिस्को संगीत के किंग के रूप में बनायी पहचान

बॉलीवुड में बप्पी लाहिरी एक एसे संगीतकार के रूप में याद किया जायेगा,जिन्होंने ताल वाद्ययंत्रों के प्रयोग के साथ फिल्मी संगीत में पश्चिमी संगीत का समिश्रण करके बाकायदा .डिस्को थेक .की एक नयी शैली ही विकसित कर दी। अपने इस नये प्रयोग की वजह से बप्पी लाहिरी को कैरियरके शुरूआती दौर में काफी आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा लेकिन बाद में श्रोताओं ने उनके संगीत को काफी सराहा और वह फिल्म इंडस्ट्री में 'डिस्को किंग' के रूप में विख्यात हो गये। 27 नवंबर 1952 को पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर में जन्में बप्पी लाहिरी का मूल नाम आलोकेश लाहिरी था। उनका रूझान बचपन से ही संगीत की ओर था। उनके पिता अपरेश लाहिरी बंगाली गायक थे, जबकि मां वनसरी लाहिरी संगीतकार और गायिका थी। माता-पिता ने संगीत के प्रति बढ़ते रूझान को देख लिया और इस राह पर चलने के लिये प्रेरित किया। 

बचपन से ही बप्पी लाहिरी यह सपना देखा करते थें कि संगीत के क्षेत्र में वह अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर सकें। महज तीन वर्ष की उम्र से ही बप्पी लाहिरी ने तबला बजाने की शिक्षा हासिल करनी शुरू कर दी। इस बीच उन्होंने अपने माता.पिता से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा भी हासिल की। बतौर संगीतकार बप्पी लाहिरी ने अपने कैरियर की शुरूआती वर्ष 1972 में प्रदर्शित बंग्ला फिल्म 'दादू' से की लेकिन फिल्म टिकट खिड़की पर नाकामयाब साबित हुयी। अपने सपनो को साकार करने के लिये बप्पी लाहिरी ने मुंबई का रूख किया। वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म नन्हा शिकारी बतौर संगीतकार उनके करियर की पहली हिंदी फिल्म थी लेकिन दुर्भाग्य से यह फिल्म भी टिकट खिड़की पर नकार दी गयी।