असम के चुनावी संग्राम में कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व सीएम तरुण गोगोई निधन के बाद भी अहम फेक्टर बने हुए हैं। इसी साल गणतंत्र दिवस के मौके पर केंद्र सरकार की ओर से उन्हें मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान से नवाजा गया, साथ ही अब तक बीजेपी की कोई ऐसी चुनावी सभा नहीं हुई है, जिसमें किसी न किसी रूप में गोगाई की तारीफ न की गई हो। आखिर वह क्यों हुए खास?

गोगोई राज्य की सियासत में खास भूमिका रखते थे और राज्य की सियासत में वह गिने-चुने कद्दावर नेताओं में थे। उनके चेहरे के जरिए कांग्रेस 2006 से 2016 तक लगातार सत्ता में रही।

उनको इस बात का भी श्रेय दिया जाता था कि उन्होंने राज्य में दशकों से चली आ रही खूनी हिंसा का दौर खत्म कर विकास और अमनचैन का दौर स्थापित किया। वह अहोम समाज से आते थे जो कि असम की खांटी असमिया पहचान से जुड़ा है। ऊपरी असम के हिस्से में अहोम समाज को दबदबे वाला माना जाता है। कहा जाता है कि जिसने ऊपरी असम जीता, सत्ता उसी की होती है। 

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय में हुए असम समझौते के बाद इस इलाके में असमिया अस्मिता की भावना लगातार मजबूत होती गई। यही वजह है कि पूरे असम की तुलना में ऊपरी असम में नागरिकता संशोधन बिल (सीएए) के खिलाफ विरोध काफी तेज है। इसके चलते बीजेपी और एनडीए के खिलाफ माहौल बन रहा है। बीजेपी उस नाराजगी को दूर करने के लिए असम की अस्मिता की बात भी कर रही है। वह कांग्रेस सहित दूसरे दलों पर वहां घुसपैठ को बढ़ावा देने का आरोप भी लगा रही है।

कांग्रेस ने इस बार तरुण गोगोई की विचारधारा के खिलाफ जाकर बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ के साथ गठजोड़ किया है। बदरुद्दीन अजमल को बंगाली मुसलमानों को प्रश्रय देने वाला वाला माना जाता है। मूल असमी बंगालियों की घुसपैठ के सख्त के खिलाफ हैं। उनकी इस भावना को समझते हुए ही गोगोई ने ताउम्र कभी एआईयूडीएफ से कांग्रेस का गठबंधन नहीं होने दिया। अब बीजेपी कह रही है कि असम की पहचान को बचाने के लिए गोगोई ने ताजिंदगी जिस पार्टी से दूरी बना कर रखी, कांग्रेस उस पार्टी से गठबंधन करके अब उन्हें अपमानित कर रही है।