असम में हिमंत बिस्व सरमा के मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद से पिछले दो महीनों में राज्यों में हुई मुठभेड़ों की न्यायिक जांच कराने की मांग तेजी से उठ रही है। राज्य में बीते दो महीने में कम से कम 23 लोगों को पुलिस कस्टडी में गोली मार दी गई, जिसमें से पांच की मौत हो गई। इन लोगों पर मवेशी-तस्करी, बलात्कार, हत्या, नशीली दवाओं की तस्करी, डकैती के मामले दर्ज थे। यह 23 मामले 10 आतंकियों को मारे जाने से अलग हैं।  पांच जुलाई को सभी पुलिस थानों के प्रभारी अधिकारियों के साथ पहली आमने-सामने की हुई बैठक में सरमा ने कहा था कि अगर अपराधी हिरासत से भागने या पुलिस पर हमला करने के लिए हथियार छीनने की कोशिश करते हैं तो ‘उन्हें गोली मारना परिपाटी’ होनी चाहिए।

इसके बाद असम मानवाधिकार आयोग ने स्वत: संज्ञान लेते हुए सात जुलाई को राज्य सरकार को गत दो महीने में हुई उन मुठभेड़ों की परिस्थितियों की जांच कराने के आदेश दिए थे जिनमें कथित अपराधी की या तो मौत हो गई थी या घायल हुए थे। उधर सरमा ने गुरुवार को आरोपों पर जवाब देते हुए कहा कि राज्य पुलिस को कानून के दायरे में रहकर अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने की ‘पूरी आजादी’ है। विधानसभा में शून्यकाल के दौरान नेता प्रतिपक्ष देबब्रत सैकिया ने हाल में राज्य में मुठभेड़ की बढ़ती संख्याओं के मुद्दे पर चर्चा की शुरुआत की।

चर्चा का जवाब देते हुए सरमा ने सभी विधायकों से अपील की कि वे संदेश दें कि सदन किसी भी प्रकार के अपराध के खिलाफ है। सरमा ने सदन को अवगत कराया कि गत दो महीनों के दौरान पुलिस के साथ हुई मुठभेड में 15 कथित अपराधी मारे गए जबकि 23 अन्य घायल हुए। ये मुठभेड़ कथित अपराधियों द्वारा पुलिस के हथियार छीनकर हमला करने और भागने की कोशिश के दौरान हुई।

सरमा ने बताया कि गत दो महीने में मवेशियों की तस्करी के मामले में कुल 504 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और इनमें से केवल चार आरोपी भागने की कोशिश के दौरान पुलिस की गोली से घायल हुए हैं। उन्होंने कहा, 'वह पुलिस है, जो इन अपराधियों को अस्पताल ले गई, इलाज कराया और उसके बाद अदालत में पेश किया। हमारी मुख्य कोशिश अपराधियों को सजा दिलाना है।'

इसी महीने असम मानवाधिकार आयोग ने मारे गए लोगों के संदर्भ में जांच करने के आदेश दिए। अंग्रेजी अखबार के अनुसार आयोग के सदस्य नाबा कमल बोरा ने कहा- न्यूज़ रिपोर्ट्स का दावा है कि जब यह मारे गए तो इनकी हाथ में हथकड़ी लगी थी। ऐसे में हमें जानने की जरूरत है कि क्या हुआ था। आयोग ने स्वत: संज्ञान लेते हुए सात जुलाई को राज्य सरकार को गत दो महीने में हुई उन मुठभेड़ों की परिस्थितियों की जांच कराने के आदेश दिए थे जिनमें कथित अपराधी की या तो मौत हो गई थी या घायल हुए थे।