असम के विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश के एक इलाके की 26 मुस्लिम महिलाएं सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर पहुंच गई हैं। सुप्रीम कोर्ट के पास पहुंचने वाली इन महिलाओं ने वोटर लिस्ट में शामिल अपने नाम को लेकर एक याचिका दायर की है। महिलाओं का कहना है कि वोटर लिस्ट में उनका नाम डाउटफुल वोटर्स यानि संदिग्ध मतदाता के रूप में दर्ज है।

याचिका दायर करने वाली ये सभी महिलाएं बरपेटा जिले की निवासी हैं। इन महिलाओं का कहना है कि उनका नाम बिना किसी तर्क या कारण के इस संदिग्ध सूची में डाला गया है। महिलाओं की याचिका पर चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने चुनाव आयोग, केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा है। सभी पक्षों को 4 हफ्ते में जवाब दाखिल करने को कहा गया है।

याचिका दायर करने वाली इन महिलाओं में तहमीना खातून और 25 अन्य लोग शामिल हैं। इन सभी ने सुप्रीम कोर्ट में 2019 में एक याचिका दायर करते हुए कहा था कि उनका नाम डी-वोटर लिस्ट में दर्ज कर दिया गया है। हालांकि अधिकारियों ने ऐसा क्यों किया और इसका आधार क्या है..इसके लिए अब तक कोई भी लीगल पेपर नहीं दिखाया है।

इस याचिका पर अपना जवाब दाखिल करते हुए चीफ इलेक्टोरियल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर ने कहा था कि रेकॉर्ड्स के हिसाब से तहमीना और इन सभी महिलाओं के नाम के आगे 1997 में डी-वोटर का टैग लगाया गया था। हालांकि तब से ही इस कार्रवाई के पक्ष में कोई ठोस दस्तावेज पेश नहीं किए गए। अधिकारियों ने यह भी कहा कि डी-वोटर बनाने के संबंध में फिलहाल इन महिलाओं के खिलाफ कोई कागज मौजूद भी नहीं है।

महिलाओं ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग करते हुए कहा कि संविधान में ऐसा कोई नियम नहीं है, जिसमें किसी वोटर को डाउटफुल वोटर बनाकर रखा जाए। ऐसे में इस लिस्ट से उनका नाम हटाया जाना चाहिए, क्योंकि इससे उनकी भारतीय नागरिकता प्रभावित हो रही है। इसके अलावा ऐसा होने से उनके मौलिक अधिकारों का हनन भी हो रहा है। महिलाओं की दलील के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले को गंभीर माना है और इस संबंध में निर्वाचन आयोग, केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार से जवाब तलब किया है।