‘पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल प्रदेश’ (पीपीए) ने 1987 के राज्य गठन अधिनियम को ‘दोषपूर्ण’ बताते हुए मुख्यमंत्री पेमा खांडू तथा राज्य के सांसदों से इसमें सुधार के लिए केंद्र के साथ बातचीत करने की अपील की। अरुणाचल प्रदेश की स्थापना 20 फरवरी 1987 को हुई थी और इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिला था।

पीपीए के महासचिव कलिंग जेरांग ने एक बयान में आरोप लगाया कि विधानसभा की संवैधानिक सहमति के बिना संसद द्वारा पारित अधिनियम में राज्य के मूलनिवासी लोगों की चिंताओं और पीड़ाओं की अनदेखी की गई। उन्होंने कहा, ‘‘ पीपीए लगातार राज्य के लोगों को यह याद दिलाती रही है कि लोग कैसे इस दोषपूर्ण अधिनियम के साथ रह रहे हैं, जो खोखला है और यह अपनी जमीन, नदियों, वनों और खनिजों पर मूलनिवासी लोगों के मालिकाना हक के बारे में कुछ नहीं कहता है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘अब जब राज्य और केंद्र में एक ही राजनीतिक दल का शासन है, ऐसे में लंबित मुद्दों पर नए सिरे से बात करने के लिए इससे अच्छा अवसर नहीं हो सकता।’’ जेरांग ने कहा कि पार्टी मांग करती रही है कि नागालैंड और मिजोरम जैसे राज्यों के लोगों को जो अधिकार दिए गए हैं वैसे ही संवैधानिक अधिकार यहां के लोगों को भी दिए जाएं।

1912-13 की बात है, जब ब्रिटिश राज ने पश्चिमी हिस्से के बालीपाड़ा इलाके, पूर्वी हिस्से के सादिया फ्रंटियर और दक्षिणी हिस्से में अबोर व मिशिमी पहाड़ियों के साथ ही तिराप फ्रंटियर को जोड़कर उत्तर पूर्व फ्रंटियर एजेंसी के तौर पर गठित किया। इसी का वर्तमान स्वरूप अरुणाचल प्रदेश है। लेकिन 100 साल से भी लंबे इस इतिहास में इस राज्य के बनने के कई दिलचस्प मोड़ छुपे हुए हैं। 20 जनवरी 1972 वो तारीख थी जब भारत के केंद्रशासित प्रदेश के रूप में इस राज्य का गठन हुआ था।  और नया नाम अरुणाचल प्रदेश रखा गया था। 1972 तक यह पूर्वोत्‍तर सीमांत एजेंसी के नाम से जाना जाता था। अरुणाचल प्रदेश नाम का मतलब था कि भारत का ‘सूर्य उदय’ इस पहाड़ी प्रदेश से होता है। यह नामकरण तब रिसर्च के डायरेक्टर विभाबसु दास शास्त्री और चीफ कमिश्नर केएएए राजा ने किया था।